Thursday, November 11, 2010

अपने होने के विरुद्ध

एक बैचेनी ,
उमस शहर के भीतर ,
कोई गांठता है ,जुते धुप मे,
कहते है देश मे गरीबी है....
हजारो टन "अनाज" मंडियों मे सड़ हो गया .
"भण्डारण क्षमता" ......बिम्ब ...,
बिम्ब ..."भूख" ...बिम्ब....."गरीबी" ....,
पेट्रोल ,डीजल महंगा बिम्ब ...

रेत की लहरे उफनती है ,
मौन को पचाए रखना ,
"उल्टी"..से सब सामने आ जायेगा ,
अर्थ भरा संकेत हर बार की तरह ,
सूखता है जब भी अभाव से,
...तालाब...या नदी ,
"वर्षा" ,, बिम्ब ,
डूब मे आया "हरसूद" ,
गाँव- खेत,घर...पशु , धन , वैभव .......,
आज शहरो मे दिहाड़ी मजदुर है ,
वे किसान थे .....,
वे सहते रहे ....भूख , ताप ,धुप, आंधी तुफ्हाँ...,
सालो से हांकते ले जा रहे है अँधेरी दुनिया ,
कराहटे, चीखे टीस नही देती ..,
कान कुंद हो गये है,

अंधकार
ऐसा नही की जीने को कुछ नही बचा ,
पब ,क्लब ,माल, मल्टीप्लेक्स,ग्लोबल विलेज ,नौ-दस प्रतिशत मुद्रा स्फीति ............बहुत कुछ ,

एक चुल्लू -प्यास ,
कही कोई सुरक्षित जल धारा;
पौधे के पोर-पोर मे बहती है ,
एक सन्नाटे की गूंज ..........................शोर से भी ज्यादा ,
सूखे तालाब ,बंद कुंए,कटते हुए जंगल ,
काल की मछाली ,
फाँसने बैठा ......,
अंत
बच्चा बच्चा जानता है ...बिम्ब ,
रेगिस्तान
क़त्ल के बरक्स सजा
चित्र ,बिम्ब ,धव्निया -राग रंग ,
कला ........................पारखी ,काठ ...छील,
सब जानते है कुछ नही बदलेगा ,
ईर्ष्या ,क्रोध, घृणा, छल-कपट ...अन्तः प्रेम हम लेकर पैदा होते है
आदमकद शीशो के माल,
आधुनिकता के नए स्थापत्य ,
आधुनिक पूछता है पहचान .-वाद ?
कोई भी विचार ,कोई भी शब्द जैसे ही कहा ,
वे कहते है .......जनवादी ,समाजवादी, पूंजीवादी,साम्यवादी ,प्रगतिशील....,
वादी....वादी.... वादी.......वाद वाद ...........................वाद ................................,
चुप रहो?
कोई सहमता है ,
मौन
हिलेगी नही पत्तियां ,खिलेगे नही फूल ,
न वंसत ,न पतझर ,
रात की रौशनी मे चकाचौधं है शहर ,
सुनहरा सुन्दर शहर ,]
बैचेनी के अवशेष भर हे आखों मे ,
कोई प्रतिउत्तर भी नही ,
दहकती तेज हवाओ मे,
किसी बिज मे कोई अंकुर भी नही फूटता ,
प्यास
रगों मे दोड़ता खून ,
"खून"
मजबूत दिवार पर कील,
लाल शर्ट...या लाल सलाम ,
कौन किस के विरुद्ध लड़ कर ,
अपने होने के विरुद्ध मैं ,
उस तालाब पर टाउनशिप है ,
बस्तर के जंगलो पर टाटा या एस्सार के लौह उद्यौग,
आधुनिक मनुष्य के दो अवशिष्ट
जो धीरे धीरे धरती पर फैलते जा रहे हे
कांक्रीट और प्लास्टिक

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