
मै क्यों अब तक चित्र बनाता जा रहा हूँ,
क्यों सारहीन यथार्थों में सार देखता हूँ,
क्यों काले और सफ़ेद के द्वन्द से घिरा हूँ,
किस कारण से शुन्य के अध्य्ताओं और चापलूस सेनाओं से लड़ते आ रहा हूँ,
क्यों मुझे मनुष्य के मनुष्य होने की अपेक्षा रहती हैं,
मैने अलगाव और विलोप साथ को - साथ चित्रित किया ... प्रेम और घृणा को भी ... इन भी दोनों के साथ मैने खुद को बचाया ... वुमेन इन ब्लेक या वुमेन इन रेड को चित्रित करने से से हमारे भोतिकवादी मापदंडों और बाज़ार के दबावों.
मेरे लिखित चित्र का होना उस बात पर निर्भर करता है कि इतने भोतिक शोर के बीच, सार और आसार के साथ उस जागतीत ध्वनी को सहजता और समग्रता में पढ़ा जाना
हार का कारण था कि हवा मैने, पानी और आग में, धुप में सम्यकता खोजी,
उनको ही समकालीन माना.
मै किसी महान भोगोलिक विस्तार की खोज मै नहीं था
ना में ही किसी नई अवधारणा को स्थापित करने.
एक स्थान और समय में हम चित्रकार मित्र मौन के संगीत की बातें करते, उसे गुनते - सुनते मनते थे - साथ ही शराब और सिगरेट सुलगती थी, इस रंग था मंच में शुन्य सूत्रधार. विचारों का संघर्ष था,
जाने कितने ही प्रभाव युवा पीढ़ी के कलाकारों पर पड़े, नई संभावनाओं को बहुलता से प्रकट करते उन्हें भरोसा था कि प्रचार और देखभाल बराबर
भविष्य चेहरा की निशानी कला का ...
भविष्य एक खतरे का प्रतिनिधित्व करता दिख रहा था जब में निर्वासित था आत्म मर्यादा के लिए तड़प रहा था कितने थे जो असहमति का सम्मान थे करते, सचित्र संवेदनाओं के प्रति कितने सजग ...
अगर हम उसके निज समाधान से बच भी गए तो चुप्पी का कोई विशाल चित्र नए आयामों को व्यक्त करेगा
गई बार ऐसा हुआ कि ह्रदय में कुछ घटा और बुद्धि उसके पीछे बहुत - पीछे व्याख्या करती चली.
अतीत का संधान कर स्मृतियों में अन्य लोगों की तरह काला dirghaye उस चुप्पी की संवेदनशीलता से परिचित होगी ... यह प्रश्न है?
शुन्य की रचात्कता - सकरात्का के शेष को, शेष से अनुभूत कराती है,
मनुष्य की व्यक्तिगत चेतना की तरलता, उस अव्यक्त संवेदना abhivykti है.
देखना कुछ आँखों से गहरी बात है,
हमारे भीतर की आदिम तरलता झकझोरती है,
तरलता के बिना आँखें निर्जीव है,
रूप में मौन, ध्वनी की निरंतर समान चुप्पी का असीम आयाम है. आयाम के साथ संम्पन्नता, उस संक्षिप्त पड़ाव में लिखित प्रश्न है?
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