Wednesday, November 24, 2010
Monday, November 22, 2010
Friday, November 19, 2010
Thursday, November 18, 2010
"तु".....यह संभव है
विरोध करने के लिए सूचित .....
आकाश की ओर.
पिछले साल
मैंने अपने घर को छोड़ दिया और वापसी की है.
आकाश एक दीवार के नीचे कुचल दिया गया .
जिम्मेदार.......
फिर,
विचारशील, ,
सब कुछ ठीक है...... मुझे कहते हैं
मेरे शहर, ........... एक जो की यात्रा है
पक्का...
नीचे के लिए सीढ़िया
मेरे गले में गांठ ,
गांठ मे "नमक".
उसे बताना कि
वहाँ. वह मौन गिर गया.
क्या मेरे शहर में है?
कहानी है कि मैं घर नहीं जा सकता है
जब चाहते हैं..................................... कहानी है,
पैसे की कहानी
पुनर्निर्माण.
हमें जीवित रहने के लिए. कहानी,
हम काम नहीं करते.................. कहानी
ऋण,........वे भी जो कुछ भी नहीं करते
आत्माओं, के रूप में के एक गांव
लक्जरी निवासों की कीमतों.
लोगों के जीवन की कहानी
लोग रहते हैं. निष्प्राण कैसे.
एक बार.
बुजुर्ग....................जो कहानी से उखाड़
उसकी भूमि.
दूर दूर. ............कहानी
पेशेवर, . स्कूलों के लिए सदस्यता
सेंसेक्स...... तेज गिरावट में अधिक है.
एक मरते हुए शहर की कहानी है.
उत्तर दिया,
" वह आवाज़"
किसी को भी पता नहीं है,,,,, "तु".....यह संभव है
" आप" इसे कम नहीं कर सकते.
RaajeshEknath
मौत के पेरोकर
मौत के पेरोकर ,
मौत - एक व्यक्ति की या समूह ,
नही जगाती कोई सवेंदना ,
हम सारे सीलन से भरे हैं ,
कोई आग नही...
मरने दो -जो कोई मरता है ,हमें क्या ?
भोपाल गैस रिसाव ने हजारो लोगो को मारा....
लेकिन वह नही ख़त्म कर सकी -रिश्वत ,लालच,चापलूसी....,
अंग्रेज हमें काला कुत्ता कहते थे ,
तभी से भारतीयों मै एक आनुवंशिक बदलाव आ गया..उनकी जीभ लम्बी हो गई .....
गोरे दीखते ही हमारी लार टपकने लगती है ,हाथ मांगने के लिए उठ जाते है,
गोरो के पास हर गले के नाप का पट्टा है ,
वे जानते है भारतीय स्मृतिहिन् ...जल्दी भूल जायेगे ......
इस "महाभारत" के वीर अर्जुन ,मोती,स्वराज ,दिग्विजय ,राजीव ...........धर्त्तराष्ट्र _अहमदी

उसे रेगिस्तान का दरवाजा खोलने के लिए दोषी ठहराया गया ,
उसने अपने आप को खो दिया ,जिसके लिए क्या था वह दोषी!
वह चाहता था ,क्या व्यर्थ चाहता है! उसे कभी पता था ,कभी नहीं,
कभी उसे वह पता, कभी नहीं,
कभी .....भीड़ सबसे कम, कभी साथी के पास,
इस शहर में निगलने का महत्व क्या है....कुछ करने के लिए वह आया था.
यह शहरी रूप में हमले ,
और रेगिस्तान और मृत सागर ,
निगल गया हाथ की हथेली , रेखाए,
Thursday, November 11, 2010
तुम्हारा नाम
तुम्हारा नाम,
जैसे हाथ पर बैठी चिड़िया,
तुम्हारा नाम,
जैसे जीभ पर मिश्री की डली,
ओठों पर हल्का सा कम्पन,
ढाई आखर का तुम्हारा नाम,
आ गई हाथ मे उडती हुई हवा,
घंटी की खनखनाहट........... तुम्हारा नाम,
उच्चारण जैसे ,
शांत तालाब मे पत्थर की छपाक,
रात की धीमी सी आहट के बीच,
उपजता है तुम्हारा नाम ,
कांपती पर बन्दुक के घोड़े का स्पर्श ,
तुम्हारा नाम .............,
उफ़ क्या कहू !!!!
चुम्बन काले कुहरे सा ..,
पानी ? आग ?
धीरे से .....,
तटस्थता से कहने की क्या जरुरत है,
चिर परिचित यह दर्द है,
हाथो के लिए हथेली,
ओठो के लिए अपने बच्चे का नाम.
१२/०१/०१
RaajeshEknath
खपत

सिगरेट के रूपमे राख,
आंसू के रूप मे जल ,
आवाज कोई नाम ....मैं नही,
नाम नहीं हो सकता है .
ऐसा होता है,
सुन रहे कानाफूसी,
पत्र,
इंतज़ार इस बात का,
एक गंतव्य के बिना,
निराधार,
वापसी किया जाता है,
.......कहाँ थे,
और एक पत्र हो जाता है वापस .
हार,
गाना
,....... मौसम और चलने के लिए
अधिक,
क्योंकि जूता था,आवाज करता ,
गला और जूता चलते हैं.
अंतिम लदान के लिए,
अभी भी खाली ,
खपत राख के रूप में,
जल द्वारा राख,
एक आंसू से उठाया,
मरम्मत-सपने,
क्योंकि आवाज जूते की.....
हवा में भांग ,
जो रंग भंवर के लिए समर्पित,
कर रहे हैं "मैं" वापस ,
हवाएं धीरे पीले रंग में.
आत्मा कि हवा के साथ संगत.
मुलायम दूर गति में,
"कलिंग" झुका, अशोक हारा
एक धनुष खुश, गतिशील जैसे कृष्ण.
चाँद की रोशनी में वे काले रंग की पृष्ठभूमि पर चमक रहे हैं.
नीले, नारंगी, पीले, हरे,
रंगीन रोशनी के इन आंदोलनों मे .
"हवा", ने " चित्रकार से कहा -कि अपना नाम रखो"
हर निमित्त . छवियों के निर्माता ?
प्रदर्शनी में विभिन्न नामों मे,
आपना "नाम" रखो
चित्रों की प्रदर्शनी की एक श्रृंखला का अध्ययन .
प्रदर्शन क्रमशः है,
" नृत्य," मेरी आत्मा का स्पर्श ,
" पिछले दिनो आत्मा, खड़ी ,गतिशील ,
चित्रों के बिना मै", "चाँदनी का कांटा" .............के पीर कौन जानता है?
"नाम "शामिल हैं.
चित्रकार आईना,
आपका" नाम" प्रदर्शनी है. प्रकृति, स्वतंत्रता, प्रजनन, मामले मे,
अस्तित्व और गति एक चलती छवि की भाषा,
वर्णित है एक रंगीन भूमि की प्रदर्शनी.
एक कदम से प्रकाश तत्वों की.
प्रकाश, गहराई, छाया, काला, सफेद शेष एक गणितीय समस्या,
कलाकार के लिए इन मानकों को रखना .
प्रतिबद्ध है.सरल रूप में .सरलता मौजूद है.
हर चित्र एक जीवन है.
दिल एक कहानी आँखों के साथ साझा करने के लिए .
हर तालिका कहने के लिए शब्द है.
आप के साथ कुछ शब्द कहने की तरह कहती है आँखें.
रूप
मानव प्रकृति और जीवन के इस तरह के उत्साह में.
में एक जगह" पीले, नीले बैठे. एक समर्पण, एक आत्मसमर्पण सुनाई देता है.-- Raaj

तुम क्या करते हो दर्पण के खिलाफ सवाल!!
"भूमि' की पेशकश करने के लिए नहीं,
- थोड़ा धैर्य और इस मामले में समर्थन!
यह या वह?
उसे पहचानने के लिए नहीं ,
यह एक समाधान? कोई कारण ,
रूप में इकट्ठा करने के लिए,
वह मोम है पहले से. .
तुम्हे - ग्राहक चाहिए प्रवेश पाने के लिए,
"सड़क " संकेतों से प्रकाश चुन्नी,
एक छवि इतनी असमान,
मस्तिष्क की बैग "सड़क" ,
वहाँ उद्देश्य.................................. सड़क,
सड़क ................................तत्काल समाधान पर नाम दिया जाता है- "महात्मा गाधी मार्ग"
आधुनिकता का वादा है कोई कहता है! "विकास",
लेकिन यहाँ स्वीकार करने के लिए सभी गलत कर रहे हैं,भ्रष्टाचार,
एक अंत डाल डाल पात पात , अधिक दिया उचित,,, वसंत के उत्तर - 2010 ,
रहने की संख्या के उच्चारण यहाँ एक है.......राशन कार्ड ,
नगर पालिका और राजनीतिक इतिहास में ,
" सीमेंट की सड़क".
मौसम एक शर्म की बात,
बारिश में सड़के .........
कलाकार कॉल करने के लिए गया है?
बुरा सुनसान सड़कों के बीच में गंध,
एक दस्तावेज पूछने के लिए उह .. .." आप दस्तावेज़"
सड़क की मानसिकता,
"रोटी उन्माद की " अर्जित आजीविका जब्त"
, ए.बी. रोड से जेल रोड तक .....
इस सड़क से उस सड़क तक ,
जीने में यह झंझट चुनाव में इस्तेमाल ,
सभी कमाएँ. कि सड़क ....सड़क..के कलाकार ठेकेदार है,
इस तरह, एक मृत और पुनर्जीवन हो जाएगा . "चौराहा ",
हमारे जीवन मे , "हमारे फेफड़ों के लिए सड़क" .
सड़क पर दूकान लगानेवाले बिसाती नहीं है.
वे इस देश के गौरव .. अतिक्रमण शहर के विकास के लिए महान प्रयास,
दुनिया में सड़क, आधिकारिक तौर पर छेद...... नशे की तरह "
'चुनावी वादा " ,
आवश्यकता से बात करने के प्रति.
सड़क जो शर्मिंदा,
हिंसक के लिए गली एक दुर्घटना !!
अपने होने के विरुद्ध
उमस शहर के भीतर ,
कोई गांठता है ,जुते धुप मे,
कहते है देश मे गरीबी है....
हजारो टन "अनाज" मंडियों मे सड़ हो गया .
"भण्डारण क्षमता" ......बिम्ब ...,
बिम्ब ..."भूख" ...बिम्ब....."गरीबी" ....,
पेट्रोल ,डीजल महंगा बिम्ब ...
रेत की लहरे उफनती है ,
मौन को पचाए रखना ,
"उल्टी"..से सब सामने आ जायेगा ,
अर्थ भरा संकेत हर बार की तरह ,
सूखता है जब भी अभाव से,
...तालाब...या नदी ,
"वर्षा" ,, बिम्ब ,
डूब मे आया "हरसूद" ,
गाँव- खेत,घर...पशु , धन , वैभव .......,
आज शहरो मे दिहाड़ी मजदुर है ,
वे किसान थे .....,
वे सहते रहे ....भूख , ताप ,धुप, आंधी तुफ्हाँ...,
सालो से हांकते ले जा रहे है अँधेरी दुनिया ,
कराहटे, चीखे टीस नही देती ..,
कान कुंद हो गये है,
अंधकार
ऐसा नही की जीने को कुछ नही बचा ,
पब ,क्लब ,माल, मल्टीप्लेक्स,ग्लोबल विलेज ,नौ-दस प्रतिशत मुद्रा स्फीति ............बहुत कुछ ,
एक चुल्लू -प्यास ,
कही कोई सुरक्षित जल धारा;
पौधे के पोर-पोर मे बहती है ,
एक सन्नाटे की गूंज ..........................शोर से भी ज्यादा ,
सूखे तालाब ,बंद कुंए,कटते हुए जंगल ,
काल की मछाली ,
फाँसने बैठा ......,
अंत
बच्चा बच्चा जानता है ...बिम्ब ,
रेगिस्तान
क़त्ल के बरक्स सजा
चित्र ,बिम्ब ,धव्निया -राग रंग ,
कला ........................पारखी ,काठ ...छील,
सब जानते है कुछ नही बदलेगा ,
ईर्ष्या ,क्रोध, घृणा, छल-कपट ...अन्तः प्रेम हम लेकर पैदा होते है
आदमकद शीशो के माल,
आधुनिकता के नए स्थापत्य ,
आधुनिक पूछता है पहचान .-वाद ?
कोई भी विचार ,कोई भी शब्द जैसे ही कहा ,
वे कहते है .......जनवादी ,समाजवादी, पूंजीवादी,साम्यवादी ,प्रगतिशील....,
वादी....वादी.... वादी.......वाद वाद ...........................वाद ................................,
चुप रहो?
कोई सहमता है ,
मौन
हिलेगी नही पत्तियां ,खिलेगे नही फूल ,
न वंसत ,न पतझर ,
रात की रौशनी मे चकाचौधं है शहर ,
सुनहरा सुन्दर शहर ,]
बैचेनी के अवशेष भर हे आखों मे ,
कोई प्रतिउत्तर भी नही ,
दहकती तेज हवाओ मे,
किसी बिज मे कोई अंकुर भी नही फूटता ,
प्यास
रगों मे दोड़ता खून ,
"खून"
मजबूत दिवार पर कील,
लाल शर्ट...या लाल सलाम ,
कौन किस के विरुद्ध लड़ कर ,
अपने होने के विरुद्ध मैं ,
उस तालाब पर टाउनशिप है ,
बस्तर के जंगलो पर टाटा या एस्सार के लौह उद्यौग,
आधुनिक मनुष्य के दो अवशिष्ट
जो धीरे धीरे धरती पर फैलते जा रहे हे
कांक्रीट और प्लास्टिक

मै क्यों अब तक चित्र बनाता जा रहा हूँ,
क्यों सारहीन यथार्थों में सार देखता हूँ,
क्यों काले और सफ़ेद के द्वन्द से घिरा हूँ,
किस कारण से शुन्य के अध्य्ताओं और चापलूस सेनाओं से लड़ते आ रहा हूँ,
क्यों मुझे मनुष्य के मनुष्य होने की अपेक्षा रहती हैं,
मैने अलगाव और विलोप साथ को - साथ चित्रित किया ... प्रेम और घृणा को भी ... इन भी दोनों के साथ मैने खुद को बचाया ... वुमेन इन ब्लेक या वुमेन इन रेड को चित्रित करने से से हमारे भोतिकवादी मापदंडों और बाज़ार के दबावों.
मेरे लिखित चित्र का होना उस बात पर निर्भर करता है कि इतने भोतिक शोर के बीच, सार और आसार के साथ उस जागतीत ध्वनी को सहजता और समग्रता में पढ़ा जाना
हार का कारण था कि हवा मैने, पानी और आग में, धुप में सम्यकता खोजी,
उनको ही समकालीन माना.
मै किसी महान भोगोलिक विस्तार की खोज मै नहीं था
ना में ही किसी नई अवधारणा को स्थापित करने.
एक स्थान और समय में हम चित्रकार मित्र मौन के संगीत की बातें करते, उसे गुनते - सुनते मनते थे - साथ ही शराब और सिगरेट सुलगती थी, इस रंग था मंच में शुन्य सूत्रधार. विचारों का संघर्ष था,
जाने कितने ही प्रभाव युवा पीढ़ी के कलाकारों पर पड़े, नई संभावनाओं को बहुलता से प्रकट करते उन्हें भरोसा था कि प्रचार और देखभाल बराबर
भविष्य चेहरा की निशानी कला का ...
भविष्य एक खतरे का प्रतिनिधित्व करता दिख रहा था जब में निर्वासित था आत्म मर्यादा के लिए तड़प रहा था कितने थे जो असहमति का सम्मान थे करते, सचित्र संवेदनाओं के प्रति कितने सजग ...
अगर हम उसके निज समाधान से बच भी गए तो चुप्पी का कोई विशाल चित्र नए आयामों को व्यक्त करेगा
गई बार ऐसा हुआ कि ह्रदय में कुछ घटा और बुद्धि उसके पीछे बहुत - पीछे व्याख्या करती चली.
अतीत का संधान कर स्मृतियों में अन्य लोगों की तरह काला dirghaye उस चुप्पी की संवेदनशीलता से परिचित होगी ... यह प्रश्न है?
शुन्य की रचात्कता - सकरात्का के शेष को, शेष से अनुभूत कराती है,
मनुष्य की व्यक्तिगत चेतना की तरलता, उस अव्यक्त संवेदना abhivykti है.
देखना कुछ आँखों से गहरी बात है,
हमारे भीतर की आदिम तरलता झकझोरती है,
तरलता के बिना आँखें निर्जीव है,
रूप में मौन, ध्वनी की निरंतर समान चुप्पी का असीम आयाम है. आयाम के साथ संम्पन्नता, उस संक्षिप्त पड़ाव में लिखित प्रश्न है?





