
"यदि कोई वस्तु प्रकाश की गति से गति करे तो वह स्वयं प्रकाश हो जाती है प्रेम हो जाती है".-आत्मपुजा उपनिषद
हम सबकी एक गति होती है,हमें चलते रहना होता है.साथ ही अपना आस पास चुनते है,उस आस पास को हम देखते है,हम देखना चुनते है.
देखना -अनुभव,प्रारब्ध ,वर्तमान,संकल्प, यूँ हम विकसित होते है.यह गति की प्रक्रिया है की हमे यश -अपयश प्राप्त होते रहते है,प्रत्येक गति की प्रतिगति , प्रत्येक ध्वनी की प्रतिध्वनी .यदि हमारी गति सकारात्मक है तो हमारी गति भी समृध्द ,समग्र होगी. तब हम साथ साथ चलते है तो एक दूजे के विकास मै हम भागीदार होते है. गति की दिशा एवं संकल्प धन ,यश ,प्रतिष्ठा कामनाओं की पूर्ति मै सहायक होते है,जब हम अपने आस पास के वातावरण के साथ सहज सम्बन्ध बनाते चलते है, प्रकृति से यही सम्बन्ध जीवन की आप धापी को ख़त्म कर देता है .हमे जो भी प्राप्त होता है वो हमे ख़ुशी और सकूँ देता है, प्रकृति से यही सम्बन्ध हमे अपने साथ दुसरो के भी सुख दुःख का ध्यान रखना सिखाता है,
हमारी भूख यह तय करती है की गति की दिशा और दशा क्या हो.कर्म से हम उसे अर्जन करते चलते है,कर्म ही जीवन की भूख है .
`कामना की त्रिवता ही तृष्णा बन जाती है,यह भौतिक जीवन का सत्य है,गति के लिए बल (शक्ति) की आवश्यकता होती है, वह उसे आगे की और अग्रसर ही नहीं करती वरन उसकी दिशा भी परिवर्तित कर देती है,"निरंतर फैलती हुई शक्ति."
अपने जीवन मे हमे किस बल की आवश्यकता है यह तय करना होता है,हमारी गति कैसी हो.
जब हम पैदल चल रहे होते है तो आस पास जो भी वस्तु है उसके प्रति सजग होते चलते है,रास्ता पेड़ पौधे ,धुप ,हवा, अपनी स्वाश , जहा हमे पहुचना है.
हमे और अधिक गति की जरूरत होती है, हम सायकल चला रहे होते है,हम मन और शरीर द्वारा कर्म मे होते है,स्वास के प्रति भी सजग .
हमे और अधिक गति की जरूरत होती है,हम दू पहिया वाहन पर होते है,तब सिर्फ हमारी दृष्टी और दिमाग ही काम कर रहा होता है,हमे आगे की और गति करना होता है, बिना स्वंम को नुकसान पहुचाये ,साथ ही किसी अन्य को भी नुकसान ना पहुचे ये हमे ध्यान रखना होता है ,हमे लगता है की हम वाहन चला रहे है,जबकि वह हमे सामने देखने के लिए ,गति ,ब्रैक, के लिए बाध्य करता है,
तब गति ही हमें संचालित कर रही होती है, हमारा आस-पास गुजरता रहता है,हमारी समग्रता कमजोर पड़ने लगती है,हमे और गति की जरूरत होती है,हम वाहन और तेज चलते है,हमे आगे होना है-सबसे आगे,तब हम हर आगे आने वाले को रौंदकर गुजरते है,हमे सिर्फ आगे जाना है..सबसे आगे ,यह दुसरो की गति पर जो अतिक्रमण है,यह कभी-कभी मृत्यु तक ले जाती,कभी कभी यह शाररिक होती है,कभी आंतरिक.
यह बल ही दिशा परिवर्तित करता ,यह हमारा चुनाव होता है,हमे किस गति को चुनना है,अपनी गति के लिए सिर्फ हम ही जिम्मेदार होते हे ,परिस्थितियाँ सहायक होती है,आपको कहा जाना है भीतर या बाहर या दोनों का सम्यक ............. , कर्म का यह जो काल है उस काल का जब हम अतिक्रमण नहीं करते है,तो कर्म एक आहुति होता है तब कृत -सुकृत को प्राप्त होता है.
"जहाँ भिन्न समान हो वही दूसरा दुसरे को देखा सकता है,जान सकता है, साथ चल सकता है."
हमे यह ही तय करना है, फूल के खिलने के साथ हमारे भीतर भी कुछ खिल सके ,बर्शते हम उसे समग्रता मे सजगता मे देखे,सहज होना .
तरल और सहज होना ही प्रकाश का आमंत्रण है, यदि रंग और विकसित होता तो ...प्रेम के रंग को प्रकट कर देता..
राजेश एकनाथ पाटील
" समय का मिथकीय बोध इतिहास के आक्रमक भविष्यवाद से बहुत अलग है,जहाँ भविष्य ही हमारे वर्तमान का जज बन जाता है.मिथक के कालबोध मे परिवर्तन का मूल्य "आगे बढने की होड़" मे नहीं है,
-सच पूछे तो वह कोई मूल्य ही नहीं है,वह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है,मृत्यु और पुनर्जीवन का अनवरत सिलसिला ,जिसमे अतीत और भविष्य का एक चक्राकार अनवरत सिलसिला , जिसमे अतीत और भविष्य दोनों ही चिरन्तन भविष्य मे गुम्फित हो जाते है,यह नहीं की समय की विभाजित श्रेणियां नहीं है,किन्तु उसकी गति आरम्भ से अंत तक ना जाकर दोनों को सतत और समान दर्शन मे समाहित कर लेती है,-एक ऐसी गति जिसे हम विराम कह सकते है ,जहाँ गति और गतिहीनता मे कोई भेद नहीं रह जाता.समय का मिथकीय इतिहास बोध 'इतिहास" को नकारता नहीं,इतिहास का आरम्भ ही मानव जाति के आरम्भ से जुडा है,किन्तु यह ऐसा इतिहास नहीं जो मनुष्य से ऊपर और परे है,जो अंत मे मनुष्य को ही नकारने लगता है" -निर्मल वर्मा (कला का जोखिम ,कला मिथक और यथार्थ /२५)